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अचेतन लाभ और हानि

अचेतन लाभ और हानि
मस्तिष्क का विभाजन जैसा कुछ नहीं होता जैसा कि उदाहरण दिया गया है। ऐसा केवल आपको समझाने के लिए को बताया है। अवचेतन मन को प्रयत्नपूर्वक चेतन मन मे परिवर्तित किया जा सकता है और तब वह चेतन मन का हिस्सा बन जाता है। अभी जो चेतन मन है वह कल अवचेतन हो जाता है।
सारे निर्णय चेतन मन ही करता है। अवचेतन अचेतन लाभ और हानि मन सारी तैयारी, प्रबन्ध या व्यवस्था करता है। चेतन मस्तिष्क यह तय करता है कि क्या करना है, और अवचेतन मस्तिष्क यह तय करता है कि उसे ‘कैसे’ मूर्तरूप दिया जाय ।
हमारे सारे अनुभव, जानकारी हमारे अवचेतन में संचित रहते हैं। परन्तु जब-कभी हम उनका उपयोग करना चाहते हैं, वे चेतन का हिस्सा बन जाते हैं। सिग्मण्ड फ्रायड के अनुसार हमारी दमित इच्छाएँ एवं विचार अवचेतन में संचित रहते हैं। ये हमारे व्यक्तित्व को बनाते व प्रभावित करते हैं और हमारे व्यवहार एवं आचार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
शेक्सपीयर ने कहा, “ हमारा तन बगीचा है और हम इसके बागवान हैं।” तो आप एक बागवान हैं जो विचारों के बीजों कों अवचेतन मस्तिष्क में बोते हैं, जो हमारे आदतन विचारों के अनुरूप होते हैं। हम जैसा अपने अवचेतन में बोएँगे वैसा ही फल हमें प्राप्त होगा। तदनुसार ही हमारा शरीर एवं बोध प्रकट होता है। इसलिए प्रत्येक विचार एक कारण है एवं प्रत्येक दशा एक प्रभाव है । इसी कारण, यह आवश्यक है कि हम अपने विचारों को ऐसा बनाएँ ताकि हम इच्छित स्थिति को प्राप्त कर सकें।

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प्रतिस्पर्धा क्या है? परिभाषा, विशेषताएं

pratispardha arth paribhasha visheshta;प्रतिस्पर्धा अथवा प्रतियोगिता एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमे सीमित साधन, वस्तु अथवा पद को पाने के लिए दो या दो से अधिक व्यक्ति एक साथ प्रयास करते है।
प्रतिस्पर्धा या प्रतियोगिता को एक असहगामी सामाजिक प्रक्रिया माना गया है। इसका कारण यह है कि प्रतिस्पर्द्धियों मे कम या अधिक मात्रा मे एक-दूसरे के प्रति कुछ ईर्ष्या-द्वेष के भाव पाये जाते है। प्रत्येक दूसरों को पीछे रखकर स्वयं आगे बढ़ना चाहता है, अपने उद्देश्य को प्राप्त करना चाहता है। अत्यधिक या अनियंत्रित प्रतिस्पर्धा समाज मे संगठन को ठेस पहुँचाती है और उसे विघटन की ओर ले जाती है, परन्तु साथ ही प्रतिस्पर्धा व्यक्तियों, समूहों और राष्ट्रों को प्रगति करने, आगे बढ़ने तथा अपनी स्थिति को ऊंचा उठाने की प्रेरणा भी देती है। कुशलतापूर्वक निरन्तर प्रयत्न करते रहने को प्रोत्साहित करती है, कार्य को उत्तमता के साथ पूरा करने मे मदद देती है।
आगे जानेंगे प्रतिस्पर्धा की परिभाषा और प्रतिस्पर्धा (प्रतियोगिता) की विशेषताएं।

प्रतिस्पर्धा (प्रतियोगिता) की परिभाषा (pratispardha ki paribhasha)

ग्रीन के अनुसार " प्रतिस्पर्धा मे दो या अधिक व्यक्ति या समूह समान लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयत्न करते है जिसको कोई भी दूसरों के साथ बांटने के लिए न तो तैयार होता है और न ही इसकी अपेक्षा की जाती है।
बोगार्डस के अनुसार " प्रतिस्पर्धा किसी ऐसी वस्तु को प्राप्त करने के लिए एक प्रकार की होड़ है जो इतनी मात्रा मे नही पायी जाती जिससे की माँग की पूर्ति हो सके।"
मैक्स बेवर के अनुसार " प्रतिस्पर्धा शांति पूर्ण संघर्ष है। "
फेयरचाइल्ड के अनुसार " सीमित वस्तुओं के उपयोग या अधिकार के लिए किया जाने वाला प्रयत्न प्रतिस्पर्धा है। "
बीसेंज और बीसेन्ज के अनुसार " दो या अधिक व्यक्तियों के द्वारा समान लक्ष्य की प्राप्ति के लिए किए गए प्रयत्न को प्रतिस्पर्धा कहते है, जिसके सब हिस्सेदार नही बन सकते क्योंकि वे समान लक्ष्य सीमित है।"

प्रतिस्पर्धा (प्रतियोगिता) की विशेषताएं (pratispardha ki visheshta)

1. प्रतिस्पर्धा समाज मे दो या दो से अधिक व्यक्तियों, समूहों के मध्य होने वाली होड़ है अचेतन लाभ और हानि जिसमे व्यक्ति अथवा समूह नियबध्द तरीके से निर्धारित लक्ष्य प्राप्त करने का प्रयास करते है।
2. प्रतिस्पर्धा मे किसी तीसरे पक्ष का होना आवश्यक है जिसके समर्थन को प्राप्त करने का प्रयत्न दोनों पक्षों के द्वारा किया जाता है। दो व्यक्तियों के लिए तीसरा पक्ष ग्राहक, दो प्रेमियों के लिए वह युवती जिसका प्रेम पाने के दोनों लालायित है और परीक्षार्थियों के लिए परीक्षक है।
3. प्रतिस्पर्धा समाज मे वस्तुओं/पदों की सीमित मात्रा होने कारण होती है, क्योंकि उन वस्तुओं अथवा पदों को सभी प्राप्त करना चाहते है। यहि कारण है कि मैक्स बेवर ने प्रतिस्पर्धा को शांतिपूर्ण संघर्ष माना।
4. प्रतिस्पर्धा असहयोगी सामाजिक प्रक्रिया का एक स्वरूप है क्योंकि व्यक्ति इसमे एक दूसरे का सहयोग नही करते। लेकिन गिलिन और गिलिन ने इसे सहयोग सामाजिक प्रक्रिया माना है।
5. प्रतिस्पर्धा एक विशेषता यह है कि यह सामान्यतः एक अवैयक्तिक क्रिया होती है। आई.ए.एस. या आर.ए.एस. या माध्यमिक बोर्ड की परीक्षाओं मे बैठने वाले परीक्षार्थियों की संख्या हजारों-लाखों मे होती है, जो अपने-अपने तरीके से परिक्षा की तैयारी करते है और जिन्हें एक-दूसरे के बारे मे कोई जानकारी साधारणतः नही होती। प्रतिस्पर्धा करने वाले एक-दूसरे से अपरिचित होते हुए भी नियमों के अनुसार लक्ष्य-प्राप्ति की कोशिश करते रहते है, परन्तु कई बार प्रतिस्पर्धा करने वाले व्यक्तियों मे सीधा तथा वैयक्तिक सम्पर्क भी होता है, उदाहरण के रूप मे, एक ही स्थान या नागर अचेतन लाभ और हानि के दो व्यापारियों या उद्योगपतियों के बीच पायी जाने वाली प्रतिस्पर्धा।
6. प्रतिस्पर्धा सार्वभौमिक प्रक्रिया है। प्रत्येक समाज मे प्रत्येक समय मे प्रतिस्पर्धा किसी न किसी रूप मे पायी जाती रही है ऐसा कोई समाज नही जहाँ जितने व्यक्ति उतनी वस्तुएं, उतनी मात्रा मे रोजगार उपलब्ध हो अतः माँग और पूर्ति मे असंतुलन सभी समाजों मे पाया जाता है।अतः प्रतिस्पर्धा भी सार्वभौमिक प्रक्रिया है।
7. प्रतिस्पर्धा अचेतन प्रक्रिया है। प्रतिस्पर्धा व्यक्ति एक दूसरे के प्रयत्नों के प्रति जागरूक नही होते है। प्रतिस्पर्धा मे संलग्न व्यक्ति अपने प्रयत्नों के प्रति जागरूक रहते है पर सभी प्रतियोगियों के बारे मे जागरूक नही रहते। अतः प्रतिस्पर्धा पर अचेतन प्रक्रिया है।
7. प्रतिस्पर्धा की एक अत्यंत ही महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि प्रतिस्पर्धा मे अहिंसात्मक तरीके से लक्ष्य प्राप्ति का प्रयत्न किया जाता है। जहां संघर्ष मे हिंसा या हिंसा की धमकी का सहारा लिया जाता है, वहां प्रतिस्पर्धा मे अहिंसात्मक तरीकों पर जोर दिया जाता है।
8. प्रतिस्पर्धा एक निरन्तर प्रक्रिया है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र मे प्रतिस्पर्धा हर समय पायी जाती है।
9. प्रतिस्पर्धा जन्मजात प्रवृत्ति नही बल्कि यह सांस्कृतिक रूप से प्रतिमानित प्रक्रिया है। इसकी मात्रा सामाजिक संरचना एवं सामाजिक मूल्यों से निर्धारित होती है।

ग्लोबल वार्मिंग में नया अर्थशास्त्र

ग्लोबल वार्मिंग का प्रकोप हम चारों तरफ देख रहे हैं। बीते दिनों चेन्नई में पानी का घोर संकट उत्पन्न हुआ, तो इसके बाद मुंबई में बाढ़ का। इन समस्याओं का मूल कारण है कि हमने अपने उत्तरोत्तर बढ़ते भोग को पोषित करने के लिए पर्यावरण को नष्ट किया है और करते जा रहे हैं। जैसे मुंबई से अहमदाबाद बुलेट ट्रेन बनाने के लिए हम हजारों मैन्ग्रोव पेड़ों को काट रहे हैं। ये वृक्ष समुद्री तूफानों से हमारी रक्षा करते हैं। बिजली के उत्पादन के लिए छत्तीसगढ़ के घने जंगलों को काट रहे हैं। ये जंगल हमारे द्वारा उत्सर्जित कार्बन को सोख कर ग्लोबल वार्मिंग को कम करने में सहायता करते हैं। हमने बिजली बनाने के लिए भाखड़ा और टिहरी जैसे बांध बनाए हैं, जिनकी तलहटी में पेड़ पत्तियों के सड़ने से मीथेन गैस का उत्पादन होता है। यह गैस कार्बन डाइऑक्साइड से 20 गुना अधिक ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ावा देती है। भोग की पराकाष्ठा यह है कि मुंबई के एक शीर्ष उद्यमी के घर का मासिक बिजली का बिल 76,00,000 रुपए है। उस घर में केवल चार प्राणी रहते हैं। इस प्रकार की खपत से हम पर्यावरण का संकट बढ़ा रहे हैं तथा सूखे और बाढ़ से प्रभावित हो रहे हैं।

संसार की बेहतरीन दवा, जिससे होता है हर रोग का इलाज

एक स्वर्ण पात्र में भी यदा कदा पॉलिश करने की जरूरत पड़ती है। देखभाल के अभाव में इसमें जमे धूलकणों और गंदगी से इसकी चमक फीकी पड़ जाती है। इसी तरह एक अच्छे व्यक्ति को भी इस लगातार बदलती दुनिया में उचित देखभाल की जरूरत होती है। यह अवश्य ख्याल रखना चाहिए कि बदलाव अच्छे के लिए हो। परिवर्तन हमेशा उच्च मूल्यों की दृष्टि से हो। अच्छी संगति रखना विकास के लिए अनिवार्य है। बुरी संगति आत्मा के बंधनों को मजबूत करती है जबकि अच्छी संगति मुक्ति में सहायक होती है। संस्कृत में इसे सत्संग कहते हैं।

जब शारीरिक या मानसिक रूप से सत्संग किया जाता है तब मन अच्छे और ऊंचे प्रभावों से ऊर्जा प्राप्त कर लेता है। यह परिवर्तन उच्चतर और बेहतर लक्ष्य की ओर चलने की प्रेरणा देता है। इसके विपरीत है ‘असत्संग’ जो कड़े से कड़े बंधन में फंसा देता है। सत्संग 2 प्रकार के होते हैं-बाह्य और आंतरिक। जैसे सबसे अच्छी दवा ईश्वर स्वयं हैं, वैसे ही सबसे अच्छा सत्संग भी खुद ईश्वर ही हैं। आंतरिक सत्संग ईश्वर का सत्संग है। यानी सारा दिन जब शरीर सांसारिक कार्यों में व्यस्त रहता है तब भी ईश्वर का भाव लेते रहना चाहिए। जो आंतरिक सत्संग करता है उसे बाहरी सत्संग में भी यथा सम्भव भाग लेना चाहिए। किंतु यदि वे कभी ऐसा न कर सकें तो भी कोई हानि नहीं होगी।

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अवचेतन मन क्या है एवं इसका उपयोग कैसे करे ?

मनोवैज्ञानिकों ने मन को दो बड़े भागों में विभक्त किया है।
1. चेतन मन – मस्तिष्क का वह भाग, जिसमें होने वाली क्रियाओं की जानकारी हमे होता हैं, चेतन मस्तिष्क है। यह वस्तुनिष्ठ एवं तर्क पर आधारित होता है।
2. अवचेतन मन – जाग्रत मस्तिष्क के परे मस्तिष्क का हिस्सा अवचेतन मन होता है। हमें इसकी जानकारी नहीं होती। इसका अनुभव कम ही होता है।

Iceberg

उदाहरण के रूप में समझें तो इसकी स्थिति पानी में तैरते हीमखण्ड (Iceberg)की तरह है। हिमखण्ड का मात्र 10 प्रतिशत भाग पानी की सतह से ऊपर दिखाई देता है और शेष 90 प्रतिशत भाग सतह से नीचे रहता है। चेतन मस्तिष्क भी सम्पूर्ण मस्तिष्क का दस प्रतिशत ही होता है। मस्तिष्क का नब्बे प्रतिशत भाग साधारणतया अवचेतन मन होता है।

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